सिस्टम की नाक के नीचे चल रहा था अवैध शराब का बड़ा खेल!
A major illicit liquor operation was running right under the system's nose!

भानुप्रतापपुर में ठिकाना, गरियाबंद के दो गुप्ता भाइयों की गिरफ्तारी, हजारों ढक्कन, बोतलें, स्टीकर और होलोग्राम बरामद—आखिर किसके संरक्षण में फल-फूल रहा था यह नेटवर्क?
आठ आरोपियों के जेल जाने के बाद दो और गिरफ्तार, अब सवाल—क्या पुलिस कथित सप्लाई नेटवर्क की जड़ तक पहुंचेगी, या छोटे चेहरों तक ही सिमट जाएगी कार्रवाई?
सुनील कुमार
रायपुर : गरियाबंद/भानुप्रतापपुर। अवैध शराब के कारोबार को लेकर सामने आया मामला अब केवल कुछ आरोपियों की गिरफ्तारी और खाली बोतलों की बरामदगी तक सीमित नहीं रह गया है। कांकेर पुलिस की कार्रवाई ने ऐसे कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनके जवाब सामने आना बेहद जरूरी है। अलग-अलग ब्रांडों की हजारों खाली बोतलें, पौवे, 3,380 ढक्कन, स्टीकर, होलोग्राम और बारकोड जैसी सामग्री आखिर किस उद्देश्य से एकत्र की गई थी? इतनी बड़ी मात्रा में सामग्री जुटाने, रखने और संभावित रूप से उसकी आपूर्ति करने के पीछे कौन-कौन लोग सक्रिय थे? क्या यह पूरा मामला कुछ व्यक्तियों तक सीमित था या इसके पीछे कोई संगठित नेटवर्क भी काम कर रहा है?
कांकेर पुलिस की 11 अक्टूबर 2026 की प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक, भानुप्रतापपुर थाना क्षेत्र में दर्ज प्रकरण में गरियाबंद निवासी पुरुषोत्तम गुप्ता और इंद्रजीत गुप्ता उर्फ गोलू को गिरफ्तार किया गया है। इससे पहले आठ आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेजा जा चुका है। अब इन दो गिरफ्तारियों के बाद जांच की दिशा और उसका दायरा महत्वपूर्ण हो गया है।
क्या इतना बड़ा खेल बिना किसी मजबूत नेटवर्क के संभव था?
पुलिस की कार्रवाई में सामने आई सामग्री की मात्रा इस मामले को गंभीर बनाती है। ग्राम बसंत नगर, नारायणपुर स्थित एक किराए के मकान की तलाशी के दौरान विभिन्न ब्रांडों की खाली शराब की बोतलें, पौवे, अद्धी, स्टीकर, होलोग्राम, बारकोड और ढक्कन बरामद किए गए। साथ ही जम्मू स्पेशल व्हिस्की के 180 मिलीलीटर के 30 भरे हुए पौवे भी मिले।
पुलिस को आशंका है कि बरामद सामग्री का इस्तेमाल अवैध शराब में मिलावट अथवा अनधिकृत पैकेजिंग के लिए किया जा सकता था। हालांकि, इसका वास्तविक उपयोग और आरोपियों की भूमिका जांच का विषय है।
लेकिन सवाल अपनी जगह कायम है—जब इतनी बड़ी मात्रा में अलग-अलग ब्रांडों की पैकेजिंग सामग्री एक स्थान पर जुटाई जा रही थी, तब इसके स्रोत, परिवहन, भंडारण और संभावित खरीदारों की जानकारी किसे थी? क्या यह गतिविधि लंबे समय से चल रही थी? यदि हां, तो इसकी भनक संबंधित तंत्र को पहले क्यों नहीं लगी? और यदि जानकारी थी, तो कार्रवाई अब जाकर क्यों हुई?
इन सवालों के जवाब केवल गिरफ्तारी से नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क की निष्पक्ष और गहन जांच से सामने आएंगे।
सिस्टम के भीतर किसकी भूमिका थी? जांच का सबसे अहम सवाल!
इतना बड़ा कथित अवैध कारोबार यदि लंबे समय से संचालित हो रहा था, तो उसकी पूरी कार्यप्रणाली की जांच आवश्यक है। किसी भी संगठित नेटवर्क में सामग्री की व्यवस्था, परिवहन, भंडारण, संपर्क और संभावित वितरण जैसी कड़ियों को जोड़कर देखना पड़ता है। ऐसे में जांच केवल बरामद सामग्री और गिरफ्तार आरोपियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
यह पता लगाना जरूरी है कि सामग्री कहां से खरीदी गई, उसे भानुप्रतापपुर तक कौन पहुंचाता था, इसके लिए भुगतान किस माध्यम से होता था और इसे आगे कहां भेजने की योजना थी। क्या संबंधित क्षेत्रों में किसी स्तर पर लापरवाही हुई? क्या किसी व्यक्ति ने अपने पद या प्रभाव का इस्तेमाल करके इस गतिविधि को आसान बनाया? अथवा क्या किसी अधिकारी या कर्मचारी की संलिप्तता के प्रमाण मौजूद हैं?
यदि किसी प्रभावशाली व्यक्ति या तंत्र के भीतर बैठे व्यक्ति की भूमिका के प्रमाण मिलते हैं, तो उसकी पहचान और जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है जितनी गिरफ्तार आरोपियों की।
फिलहाल कांकेर पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति में किसी बड़े अधिकारी के संरक्षण या विभागीय मिलीभगत की पुष्टि नहीं की गई है। इसलिए किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुए इस पहलू की जांच होनी चाहिए कि कहीं किसी स्तर पर संरक्षण, लापरवाही या मिलीभगत ने कथित कारोबार को आगे बढ़ने का अवसर तो नहीं दिया।
गरियाबंद कनेक्शन की पूरी पड़ताल जरूरी, कॉल डिटेल खोल सकती है संपर्कों की परतें
इस मामले में गरियाबंद निवासी दो आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद जिले तक संभावित आपूर्ति और संपर्कों की जांच महत्वपूर्ण हो गई है। यदि गिरफ्तार आरोपियों का गरियाबंद में कथित वितरण नेटवर्क से संबंध सामने आता है, तो यह जानना आवश्यक होगा कि उस नेटवर्क में कौन-कौन लोग शामिल थे और उनकी भूमिका क्या थी।
पुलिस यदि कानूनी प्रक्रिया के तहत उपलब्ध कॉल डिटेल रिकॉर्ड, डिजिटल साक्ष्य, वित्तीय लेनदेन, परिवहन संबंधी दस्तावेजों और अन्य प्रासंगिक रिकॉर्ड की जांच करती है, तो संपर्कों और संभावित लेनदेन की कड़ियां सामने आ सकती हैं।
किससे कितनी बार बातचीत हुई? सामग्री की खरीद और परिवहन के संबंध में किन लोगों से संपर्क किया गया? क्या किसी व्यक्ति के निर्देश पर माल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाया जा रहा था? क्या संभावित आपूर्ति से जुड़े अन्य लोगों की भूमिका भी सामने आती है?
इन सवालों का जवाब अनुमान से नहीं, बल्कि प्रमाणों के विश्लेषण से ही मिल सकता है। यदि जांच में अन्य व्यक्तियों की संलिप्तता के साक्ष्य मिलते हैं, तो उनके विरुद्ध भी नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
आठ आरोपी जेल में, अब दो गिरफ्तारियों से खुलेगा कितना सच?
कांकेर पुलिस के अनुसार, इस प्रकरण में पहले प्रेम सिंह, उमेद्र बघेल, रोहित देवांगन, प्रदीप सलाम उर्फ प्रदीप ध्रुव, बुलेश देवांगन, गजेंद्र बघेल, जितेंद्र यादव और नवाब अंसारी को गिरफ्तार कर 15 सितंबर 2026 को न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेजा गया था। अब पुरुषोत्तम गुप्ता और इंद्रजीत गुप्ता की गिरफ्तारी के बाद पुलिस के सामने मामले की सभी कड़ियों को जोड़ने की चुनौती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि पूछताछ और अन्य साक्ष्यों से सामग्री के वास्तविक स्रोत, संभावित उपयोग, आर्थिक लेनदेन और वितरण व्यवस्था का कितना खुलासा होता है। क्या जांच में केवल प्रत्यक्ष रूप से जुड़े लोगों की भूमिका सामने आएगी, या उन लोगों तक भी पहुंचा जाएगा जिन्होंने पर्दे के पीछे से इस गतिविधि को संचालित करने में मदद की हो सकती है?
यदि किसी बड़े नेटवर्क के संकेत मिलते हैं, तो पुलिस को प्रत्येक कड़ी की स्वतंत्र पुष्टि कर आगे बढ़ना होगा। किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही होनी चाहिए।
अब पुलिस प्रशासन की असली परीक्षा—आखिर तक पहुंचेगी जांच या यहीं थम जाएगी?
अवैध शराब से जुड़ी ऐसी कार्रवाई में बरामद सामग्री और गिरफ्तारियां महत्वपूर्ण जरूर हैं, लेकिन जांच की सफलता का आकलन इस बात से भी होगा कि संबंधित सामग्री कहां से आई, किस उद्देश्य से जुटाई गई, उसका इस्तेमाल कहां होना था और संभावित आपूर्ति व्यवस्था में किन लोगों की भूमिका थी।
यदि किसी अधिकारी, कर्मचारी, कारोबारी या प्रभावशाली व्यक्ति की संलिप्तता के प्रमाण मिलते हैं, तो उसकी भूमिका की निष्पक्ष जांच और कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं, यदि किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है, तो उसकी जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या भानुप्रतापपुर में पकड़े गए इस मामले की जांच गरियाबंद तक संभावित संपर्कों और आपूर्ति की कड़ियों को जोड़ेगी? क्या कॉल डिटेल, वित्तीय लेनदेन और अन्य साक्ष्यों से पर्दे के पीछे सक्रिय लोगों की पहचान हो सकेगी? और यदि किसी प्रभावशाली व्यक्ति की भूमिका सामने आती है, तो क्या पुलिस उसके विरुद्ध भी निष्पक्ष कार्रवाई करेगी?
इन सवालों के जवाब आने बाकी हैं। फिलहाल कांकेर पुलिस की कार्रवाई ने जांच के लिए एक महत्वपूर्ण आधार उपलब्ध कराया है। अब जरूरत है कि जांच की हर कड़ी को साक्ष्यों के आधार पर परखा जाए और मामला केवल गिरफ्तार व्यक्तियों तक सीमित न रह जाए।
सवाल: इतनी बड़ी मात्रा में अवैध शराब की पैकेजिंग में इस्तेमाल की आशंका वाली सामग्री आखिर कहां से आई, इसे किसने जुटाया और इसका संभावित इस्तेमाल कहां होना था? इस पूरे मामले की तह तक पहुंचना पुलिस प्रशासन की जिम्मेदारी है। यदि कोई बड़ा नेटवर्क या प्रभावशाली व्यक्ति इसमें शामिल है, तो उसे भी साक्ष्यों के आधार पर जांच के दायरे में लाया जाना चाहिए।




