छह दिन से भूखा बैठा दिव्यांग… प्रशासन ने दिखाई ताकत!
Differently-abled person starving for six days... Administration flexes its muscle!

इलाज के नाम पर जबरन एम्बुलेंस में बैठाकर अस्पताल ले जाने का आरोप, पुलिसकर्मियों के बीच रायपुर रेफर की पर्ची;
पीछे नगर पालिका ने उजाड़ दिया धरना स्थल का पंडाल…
गरियाबंद। जिस गांधी मैदान में एक असहाय दिव्यांग पिछले छह दिनों से अपनी मांगों को लेकर भूखा-प्यासा बैठा है, कल बीते शनिवार को प्रशासनिक कार्रवाई का ऐसा दृश्य सामने आया, जिसने मानवीय संवेदनाओं और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि अपनी मांगों को लेकर धरने पर बैठे अनिल यादव को इलाज कराने के नाम पर नायब तहसीलदार योगेंद्र देवांगन की मौजूदगी में जबरदस्ती एम्बुलेंस में बैठाकर जिला अस्पताल ले जाया गया।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार अनिल यादव लगातार यह कहता रहा कि वह स्वस्थ है और उसे किसी प्रकार की परेशानी नहीं है। इसके बावजूद उसे पुलिसकर्मियों की मदद से एम्बुलेंस में बैठाया गया। इतना ही नहीं, जिला अस्पताल पहुंचने के बाद उसके लिए रायपुर रेफर किए जाने की पर्ची भी बना दी गई । अनिल का विरोध लगातार जारी रहा, लेकिन उसकी बात सुने जाने के बजाय प्रशासनिक शक्ति के सामने उसकी आवाज दबती नजर आई।
क्या एक भूखे दिव्यांग की आवाज इतनी कमजोर है?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि अनिल यादव अपनी इच्छा से इलाज कराने को तैयार नहीं था और स्वयं को स्वस्थ बता रहा था, तो उसे किस प्रशासनिक आदेश अथवा कानूनी आधार पर जबरन अस्पताल ले जाया गया? क्या किसी सक्षम अधिकारी का लिखित आदेश मौजूद था? यदि आदेश था तो उसे अनिल यादव को क्यूं दिखाया नहीं गया?
इन सवालों के जवाब अब स्थानीय प्रशासन से मांगे जा रहे हैं। एक दिव्यांग व्यक्ति, जो छह दिनों से अपनी मांगों को लेकर गांधी मैदान में शांतिपूर्ण धरने पर बैठा था, उसके साथ प्रशासन का यह व्यवहार मानवीय संवेदना का परिचायक होना चाहिए था या फिर प्रशासनिक ताकत का प्रदर्शन?
अनिल अस्पताल पहुंचा और पीछे उजाड़ दिया गया उसका आशियाना
मामला यहीं नहीं रुका। जैसे ही अनिल यादव को एम्बुलेंस से अस्पताल ले जाया गया, उसके धरना स्थल पर नगर पालिका के कर्मचारी पहुंच गए और वहां लगाए गए पंडाल को हटाना शुरू कर दिया। पंडाल में लगी महात्मा गांधी की तस्वीर तक निकालकर फेंके जाने का आरोप है। बैनर हटाए गए और धरना स्थल को पूरी तरह उखाड़ दिया गया।
यह कार्रवाई उस समय किए जाने की बात सामने आई है, जब कल शनिवार को प्रशासनिक अवकाश का दिन था। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि नगर पालिका कर्मचारियों को धरना स्थल हटाने का आदेश किसने दिया? क्या इसके लिए कोई लिखित प्रशासनिक आदेश था? यदि आदेश था तो उसकी प्रति सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
मानवाधिकार आयोग तक पहुंच सकता है मामला
नायब तहसीलदार योगेंद्र देवांगन की भूमिका तथा नगर पालिका कर्मचारी धरम वर्मा और सोनू सैनिक (राजस्व प्रभारी) की कथित भूमिका को लेकर मानवाधिकार आयोग में शिकायत किए जाने की बात सामने आई है। वहीं, बिना स्पष्ट प्रशासनिक आदेश धरना स्थल को तहस-नहस करने और अवकाश के दिन पद के कथित दुरुपयोग के मामले में संबंधित कर्मचारियों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराने की तैयारी की भी जानकारी सामने आई है।
प्रशासन से अब जवाब जरूरी है
यह पूरा घटनाक्रम केवल अनिल यादव के धरने का मामला नहीं रह गया है। यह सवाल अब गरियाबंद के प्रशासनिक तंत्र की संवेदनशीलता पर खड़ा हो गया है।
एक ओर छह दिनों से भूखा-प्यासा बैठा एक दिव्यांग अपनी आवाज शासन तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा था, दूसरी ओर उसे उठाने के लिए पुलिस बल का इस्तेमाल और उसके पीछे उसके धरना स्थल को उजाड़ देने की कार्रवाई—क्या यही लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासन और आम नागरिक के बीच संवाद का तरीका है?
अनिल यादव की मांगें जायज हैं या नहीं, इसका फैसला प्रशासन और कानून करेगा। लेकिन उसकी बात सुने बिना उसकी आवाज को दबाना और उसके संघर्ष के स्थान को ही मिटा देना—यह सवाल अब गरियाबंद के साथ-साथ मानवाधिकार और प्रशासनिक जवाबदेही के सामने भी खड़ा है।
जब एक दिव्यांग छह दिनों से भूखा-प्यासा होकर अपनी बात कह रहा था, तब उसे समझाने के लिए प्रशासन के पास संवाद नहीं था या केवल पुलिस और प्रशासनिक ताकत ही बची थी?



