छत्तीसगढ़

‘जो नहीं भोलेनाथ का, वो नहीं हमारी जात का’, डीलिस्टिंग कानून के लिए जनजातीय समाज ने फूंका बिगुल

'He who is not of Bholenath, is not of our caste', tribal community blows the trumpet for delisting law

अंबिकापुर। डिलिस्टिंग कानून की मांग को लेकर देशभर का जनजातीय समाज लामबंद हो गया है। जनजातीय समाज का दावा है कि देशभर में 18 प्रतिशत मतांतरित ही 80 प्रतिशत लाभ उठा रहे हैं। शेष 82 प्रतिशत मूल जनजाति समाज सुविधाओं से वंचित है।

यही कारण है कि अनुसूचित जनजाति की सूची से मतांतरितों को बाहर करने की मांग को लेकर 24 मई 2026 को दिल्ली के रामलीला मैदान में महारैली प्रस्तावित है।

 

जनजातीय समाज का कहना है कि जनजाति, आदि मत और परंपरागत विश्वासों को छोड़कर ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाने वाले लोग आज भी अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में बने हुए हैं, जिससे मूल जनजातीय समाज को मिलने वाले संवैधानिक अधिकारों, आरक्षण और शासकीय लाभों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इसी असंतुलन और कथित संवैधानिक अन्याय के विरोध में दिल्ली में महारैली का आह्वान किया गया है।

जनजातीय सुरक्षा मंच के अनुसार, देश में लगभग 18 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति समाज का मतांतरण हो चुका है, जबकि आरोप है कि यही वर्ग जनजातीय आरक्षण और शासकीय योजनाओं का लगभग 80 प्रतिशत लाभ प्राप्त कर रहा है। वहीं, शेष 82 प्रतिशत मूल जनजातीय समाज को मात्र 20 प्रतिशत लाभ मिल पा रहा है। मंच का कहना है कि यह स्थिति न केवल सामाजिक असमानता को बढ़ा रही है, बल्कि संविधान की मूल भावना के भी विपरीत है।

डीलिस्टिंग की मांग कोई नई नहीं है। वर्ष 1967 में झारखंड के लोहरदगा से सांसद रहे कार्तिक उरांव ने पहली बार लोकसभा में यह मुद्दा उठाया था। उनके प्रयासों के बाद संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) का गठन किया गया था। जेपीसी की रिपोर्ट में स्पष्ट सिफारिश की गई थी कि “अनुच्छेद 342 की कंडिका 2 में निहित किसी बात के होते हुए भी, जिसने जनजातीय आदि मत और विश्वासों का परित्याग कर ईसाई या इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया हो, उसे अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं माना जाए।”

हालांकि, आज तक इस सिफारिश को कानून का रूप नहीं दिया जा सका।बाद में वर्ष 2006 में जनजातीय सुरक्षा मंच का गठन किया गया, जिसने इस मांग को संगठित आंदोलन का स्वरूप दिया। मंच द्वारा लगातार ज्ञापन, हस्ताक्षर अभियान, जिला व प्रांत स्तरीय रैलियों के माध्यम से डिलिस्टिंग कानून की मांग को जन-जन तक पहुंचाया गया। संगठन का नारा है ‘जो नहीं भोलेनाथ का, वो नहीं हमारी जात का।’ इसके माध्यम से मंच यह संदेश दे रहा है कि जनजातीय पहचान आस्था, संस्कृति और परंपराओं से जुड़ी है।

जनजातीय सुरक्षा मंच के प्रांत सह संयोजक इन्दर भगत ने बताया कि छत्तीसगढ़ में भी इस महारैली को लेकर व्यापक तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। उत्तर छत्तीसगढ़ के जनजाति बहुल जिलों में गांव-गांव बैठकों का दौर जारी है। प्रत्येक ग्राम से कम से कम 15 लोगों को दिल्ली रैली में शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है।

वहीं, प्रत्येक जिले से लगभग 10 हजार लोगों की भागीदारी की योजना बनाई गई है। जनजातीय सुरक्षा मंच के पदाधिकारियों ने बताया कि इस महारैली में पूर्वोत्तर राज्यों सहित देश के सभी जनजाति बहुल क्षेत्रों से लोग शामिल होंगे। मंच का दावा है कि यह रैली अब तक की सबसे बड़ी जनजातीय एकजुटता का प्रदर्शन होगी।

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