छत्तीसगढ़

24 मई को रामलीला मैदान में आदिवासियों की हुंकार

The roar of the tribals at Ramlila Maidan on May 24

रायपुर। पूर्व भाजपा मंत्री और जनजातीय सुरक्षा के राष्ट्रीय संयोजक गणेशराम भगत ने देशभर के आदिवासियों को एकजुट करने का निर्णय लिया है। उन्होंने 24 मई को दिल्ली के रामलीला मैदान में ‘चलो दिल्ली आंदोलन आयोजित करने की घोषणा की है। इस आंदोलन का उद्देश्य मतांतरित आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) आरक्षण सूची से हटाने की मांग करना है।

गणेशराम भगत का दावा है कि इस रैली में छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, गुजरात, मिजोरम, नगालैंड, मेघालय और राजस्थान सहित विभिन्न राज्यों से पांच लाख से अधिक आदिवासी शामिल होंगे। उनका कहना है कि देश की 705 जनजातियों की भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ में आदिवासी जनसंख्या 32 प्रतिशत है, जबकि पूर्वोत्तर राज्यों में यह आंकड़ा 50 प्रतिशत से अधिक है।

जनजातीय सुरक्षा मंच की मांग है कि जो आदिवासी लोग अपनी परंपराएं छोड़ चुके हैं, उन्हें संवैधानिक संशोधन के माध्यम से आरक्षण से बाहर किया जाए। भाजपा समर्थित आदिवासी नेता भले ही इस आंदोलन में सीधे शामिल नहीं हो रहे हैं, लेकिन वे अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन कर रहे हैं।

गणेशराम भगत के अनुसार, जिन जनजातीय लोगों ने अपने जातिगत रीति-रिवाज, परंपरा और विश्वास त्यागकर ईसाई या मुस्लिम धर्म अपनाया है, उन्हें अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर करना ही डीलिस्टिंग है। पहले ही जिला और प्रदेश स्तर पर रैलियां आयोजित की जा चुकी हैं और अब यह आंदोलन देश की राजधानी में होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पोस्टकार्ड भेजकर अनुच्छेद 342 में संशोधन की मांग के लिए गांव-गांव संपर्क अभियान तेज किया गया है।

जनजातीय सुरक्षा मंच का कहना है कि देश में लगभग 18 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति समाज का मतांतरण हो चुका है और यही वर्ग जनजातीय आरक्षण तथा सरकारी योजनाओं का लगभग 80 प्रतिशत लाभ प्राप्त कर रहा है। मंच का दावा है कि इससे सामाजिक असमानता बढ़ रही है और यह संविधान की मूल भावना के विपरीत है।

मंच के प्रांत सह-संयोजक इन्दर भगत ने बताया कि प्रदेश के जनजाति बहुल जिलों में गांव-गांव बैठकों का आयोजन किया जा रहा है। प्रत्येक जिले से लगभग 10 हजार लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने की योजना बनाई गई है।

डीलिस्टिंग की मांग नई नहीं है। वर्ष 1967 में झारखंड के लोहरदगा से सांसद कार्तिक उरांव ने पहली बार लोकसभा में यह मुद्दा उठाया था। उनके प्रयासों के बाद संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) का गठन किया गया था। समिति ने सिफारिश की थी कि “अनुच्छेद 342 की कंडिका 2 में निहित किसी बात के होते हुए भी, जिसने जनजातीय आदि मत और विश्वासों का परित्याग कर ईसाई या इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया हो, उसे अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं माना जाए।” हालांकि, इस सिफारिश को अब तक कानून का रूप नहीं दिया जा सका है।

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