अमित शाह की चुनौती सफल: बस्तर के जंगलों में माओवादियों की ताकत कम, केवल 10 सक्रिय नेता बचे
Amit Shah's challenge succeeds: Maoists' strength diminishes in Bastar forests, with only 10 active leaders remaining.

जगदलपुर: चार साल पहले जब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने माओवादी हिंसा के समूल अंत की समयसीमा तय की थी, तब इस घोषणा को लेकर कई तरह की शंकाएं जताई गई थीं। दशकों से जंगलों के भीतर जड़ें जमा चुके माओवादी नेटवर्क को समाप्त करना आसान नहीं माना जाता था। खुद माओवादी संगठन ने भी इस घोषणा को चुनौती के रूप में लिया था।
हालांकि, बीते कुछ वर्षों में हालात तेजी से बदले हैं। कभी कई जिलों में फैला माओवादी प्रभाव अब बस्तर के सीमित जंगलों तक सिमट गया है। सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और बड़े माओवादी नेताओं के मारे जाने तथा समर्पण के बाद संगठन की स्थिति काफी कमजोर हो चुकी है।
समर्पण कर चुकी माओवादी पदमी उस दौर को याद करती है जब संगठन अपनी ताकत बढ़ाने के प्रयास में जुटा हुआ था। वह बताती है कि वर्ष 2022 में अबूझमाड़ के भीतर माओवादियों ने कई बड़े आयोजन किए थे।
इन सभाओं में शीर्ष माओवादी बसव राजू, भूपति, देवजी और रुपेश सहित अन्य नेता मौजूद रहते थे। दर्जनों गांवों से चार से पांच हजार आदिवासी इन कार्यक्रमों में शामिल होते थे। इसी दौरान बड़ी संख्या में युवाओं को संगठन में भर्ती किया गया था।
पदमी भी उन्हीं युवाओं में शामिल थी। भर्ती के बाद उन्हें प्रशिक्षण दिया गया और जल्द ही हाथों में बंदूक थमाकर जंगलों में भेज दिया गया। माओवादी नेतृत्व को उम्मीद थी कि नई भर्ती से संगठन और मजबूत होगा। लेकिन अबूझमाड़ में बसव राजू के मारे जाने के बाद चार दशक से खड़ा लाल गलियारा तेजी से ढहने लगा।
हाल ही में जगदलपुर में 108 माओवादियों के सामूहिक समर्पण ने बस्तर में बदलते हालात को और स्पष्ट कर दिया है। इसके बाद अब क्षेत्र में सक्रिय शीर्ष माओवादियों की संख्या घटकर केवल 10 रह गई है।
इनमें सुकमा-दंतेवाड़ा सीमा क्षेत्र में सक्रिय दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (डीकेएसजेडसी) सदस्य तथा दक्षिण सब जोनल ब्यूरो के सचिव पापाराव, हिड़मा की बटालियन से जुड़े डीकेएसजेडसी सदस्य सोढ़ी केसा, डिविजनल कमेटी सदस्य हेमला विज्जा, चंदर कतलाम और प्रकाश माड़वी शामिल हैं।
इसके अलावा एरिया कमेटी सदस्य किशोर, रुपी, मंगेश, मनीषा कोर्राम और माड़वी नंद कुमार के नाम भी प्रमुख हैं। जानकारी के अनुसार इनके साथ 20 से 25 पार्टी सदस्य भी सक्रिय हो सकते हैं। सुरक्षा एजेंसियां इन सभी को मुख्यधारा में लाने के प्रयास तेज कर चुकी हैं।
पिछले एक वर्ष के दौरान सुरक्षा बलों की कार्रवाई ने माओवादी संगठन को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। इस दौरान शीर्ष माओवादी बसव राजू, विवेक मांझी, सहदेव सोरेन, कोसा, गुडसा उसेंडी, चलपति, जी. रेणुका, सुधाकर, गजराला रवि, एम. बालकृष्ण, हिड़मा और जोगा राव मारे गए।
इसके अलावा भूपति, देवजी, मल्लाजी रेड्डी, रुपेश, दामोदर, गोपन्ना और सुजाता जैसे शीर्ष माओवादियों के समर्पण से संगठन की रीढ़ ही टूट गई है।
बस्तर के अंदरूनी इलाकों में चार दशकों तक माओवादी प्रभाव के कारण विकास कार्य बाधित रहे। लेकिन अब धीरे-धीरे हालात बदलने लगे हैं। भैरमगढ़ के इतामपार घाट पर ग्रामीण और पूर्व माओवादी मिलकर बदलाव की नई कहानी लिख रहे हैं।
जहां कभी बंदूक और बारूदी सुरंगों का खतरा बना रहता था, वहीं अब इंद्रावती नदी पर रेत के बोरों से अस्थायी पुल बनाया जा रहा है।
तीन साल पहले इसी क्षेत्र के उसपरी इलाके में माओवादियों ने बोट संचालकों से नाव छीन ली थी, ताकि कोई भी इस रास्ते से नदी पार कर अबूझमाड़ तक न पहुंच सके। यह विकास को रोकने की उनकी रणनीति थी।
पिछले एक सप्ताह से इतामपार घाट पर अबूझमाड़ के आठ से दस गांवों के लगभग 300 ग्रामीण प्रतिदिन एकत्र होकर नदी में रेत के बोरे डालकर अस्थायी पुल तैयार कर रहे हैं।
इस पहल में समर्पित माओवादी भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। बुधरुराम और जग्गाराम, जो पहले संगठन के लिए सूचना तंत्र संभालते थे और आइईडी विस्फोट की जिम्मेदारी निभाते थे, अब उसी नदी पर पुल बनाने में ग्रामीणों का साथ दे रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि पुल बनने से बैल, धरमा, उतला, काकीलोड़, बुड़गा, झिल्ली और आंगामेटा जैसे कई गांवों तक पहुंच आसान हो जाएगी। ग्राम पंचायत सचिव कोमल निषाद के अनुसार प्रशासन इन गांवों में सड़क, प्रधानमंत्री आवास और स्कूल शुरू करने की तैयारी कर रहा है। निर्माण सामग्री पहुंचाने में नदी सबसे बड़ी बाधा थी, इसलिए ग्रामीणों ने स्वयं पुल बनाने का निर्णय लिया।




