छत्तीसगढ़

कुसुम ने दृढ़ इच्छाशक्ति और कठिन परिश्रम से बस्तर हेरिटेज मैराथन में लहराया जीत का परचम

With sheer determination and hard work, Kusum won the Bastar Heritage Marathon.

रायपुर । बस्तर की माटी की बेटियों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि यदि हौसला बुलंद हो और लक्ष्य के प्रति समर्पण हो, तो कोई भी बाधा राह नहीं रोक सकती। हाल ही में आयोजित ‘बस्तर हेरिटेज मैराथन’ में कुसुम ने अपनी अद्भुत खेल क्षमता और अदम्य साहस का परिचय देते हुए 42 किलोमीटर की फुल मैराथन में प्रथम स्थान हासिल कर पूरे क्षेत्र का नाम गौरवान्वित किया है। कुसुम ने यह चुनौतीपूर्ण दूरी मात्र 3 घंटे 18 मिनट और 43 सेकंड में पूरी कर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की। उनकी इस सफलता के पीछे महीनों का कड़ा अभ्यास और खुद को साबित करने की एक लंबी जद्दोजहद छिपी है।
कुसुम की यह जीत इसलिए भी विशेष है क्योंकि उन्होंने एक समय पैर में गंभीर चोट (इंजरी) लगने के कारण दौड़ना लगभग छोड़ दिया था।  इस बाधा के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। कुसुम को निरंतर प्रोत्साहन और मार्गदर्शन ने उन्हें दोबारा मैदान में उतरने का साहस दिया।अक्टूबर-नवंबर से पुनः अभ्यास शुरू करते हुए कुसुम ने धरमपुरा स्थित परिसर और इंजीनियरिंग कॉलेज के मैदानों में घंटों पसीना बहाया। एक दौर ऐसा भी था जब उनके लिए 50 मीटर दौड़ना भी मुश्किल था और शारीरिक भारीपन के कारण चुनौतियां अधिक थीं, लेकिन सुबह 4 बजे उठकर किए गए कड़े अभ्यास ने न केवल उन्हें शारीरिक रूप से फिट बनाया बल्कि मानसिक रूप से भी फौलादी बना दिया।
बस्तर हेरिटेज मैराथन के दौरान के अनुभवों को साझा करते हुए कुसुम ने बताया कि 42 किलोमीटर की इस लंबी दौड़ में एक वक्त ऐसा आया जब शरीर जवाब देने लगा था और पैर पूरी तरह भर चुके थे, लेकिन लक्ष्य तक पहुँचने की तड़प ने उन्हें रुकने नहीं दिया। बस्तर ब्लॉक के एक छोटे से गांव मधोता से निकलकर इस मुकाम तक पहुँची कुसुम की सफलता से पूरे गांव में हर्ष का माहौल है। ग्रामीण अपनी इस लाड़ली के स्वागत के लिए पलकें बिछाए बैठे हैं। कुसुम अब आगामी पुलिस भर्ती और अन्य राष्ट्रीय स्तर की खेल प्रतियोगिताओं के लिए पूरी ऊर्जा के साथ तैयारी में जुट गई हैं। उनकी यह उपलब्धि क्षेत्र के अन्य युवाओं के लिए एक प्रेरणा है कि विषम परिस्थितियों और संसाधनों के अभाव में भी मेहनत के दम पर सफलता का शिखर छुआ जा सकता है।

 

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