जग्गी हत्याकांड का पर्दाफाश: होटल ग्रीन पार्क में हुई साजिश
Jaggi murder case exposed: The conspiracy took place at Hotel Green Park

रायपुर। राज्य के इतिहास की सबसे चर्चित और राजनीतिक रूप से संवेदनशील राम अवतार जग्गी हत्याकांड में 23 साल बाद न्याय का पहिया घूमा है। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए पूर्व मुख्यमंत्री स्व.अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी को हत्या की साजिश रचने का दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है।
इस फैसले ने न केवल एक परिवार के दो दशक लंबे संघर्ष को विराम दिया है, बल्कि सूबे की सियासत में जोगी युग के अवशेषों पर भी संकट के बादल गहरा दिए हैं।
साजिश की जड़ें रायपुर के होटल ग्रीन पार्क में मिलती हैं
सीबीआई की जांच रिपोर्ट के पन्ने पलटें तो साजिश की जड़ें 21 मई 2003 को रायपुर के होटल ग्रीन पार्क में मिलती हैं। तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए 10 जून को एनसीपी की एक बड़ी रैली प्रस्तावित थी।
इस रैली को रोकने के लिए रची गई गुप्त बैठक में अमित जोगी ने कथित तौर पर कहा था कि एनसीपी के एक नेता को खत्म करना जरूरी है। यहीं से शूटर चिमन सिंह को सुपारी दी गई और मौत का ब्लूप्रिंट तैयार हुआ।
वह काली रात और पुलिसिया मिलीभगत
4 जून 2003 की रात मौदहापारा पुलिस थाने के पास गोलियों की तड़तड़ाहट ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया। एनसीपी नेता राम अवतार जग्गी की हत्या कर दी गई। उस दौर में आरोप लगे कि रक्षक ही भक्षक बन गए।
सीबीआई जांच में राजफाश हुआ कि तत्कालीन थाना प्रभारी वीके पांडेय, सीएसपी राकेश चंद्र त्रिवेदी और अमरीक सिंह गिल ने न केवल साक्ष्य मिटाए, बल्कि असली कातिलों को बचाने के लिए फर्जी आरोपी तक खड़े कर दिए। सत्ता के संरक्षण में जांच को भटकाने की हर संभव कोशिश की गई।
जोगी सरकार की विदाई और भाजपा का उदय
जग्गी हत्याकांड महज एक अपराध नहीं था, यह तत्कालीन जोगी सरकार के पतन का कारण बना। 2003 के विधानसभा चुनावों में राजनीतिक दमन और भय के शासन को मुद्दा बनाकर भाजपा ने सत्ता में वापसी की।
डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में भाजपा ने इसी घटनाक्रम के बाद लगातार 15 वर्षों तक प्रदेश पर शासन किया। इस हत्याकांड ने राज्य की राजनीतिक सुरक्षा और विश्वास के बुनियादी ढांचे को बदल कर रख दिया।
निचली अदालत का झटका और हाईकोर्ट का न्याय
वर्ष 2007 में विशेष अदालत ने 28 आरोपितों को तो उम्रकैद दी, लेकिन मुख्य साजिशकर्ता बताए गए अमित जोगी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। मृतक के पुत्र सतीश जग्गी ने हार नहीं मानी और हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनका तर्क सीधा था कि जिन सबूतों पर मोहरों को सजा मिली, उन्हीं पर वजीर बरी कैसे हो गया।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस अरविंद वर्मा की बेंच ने साफ कहा कि निचली अदालत का फैसला अनुमानों पर आधारित था। कोर्ट ने माना कि साजिश अंधेरे में रची जाती है और परिस्थितिजन्य साक्ष्य अमित जोगी की संलिप्तता को पुख्ता करते हैं।
फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी
स्व.राम अवतार जग्गी के बेटे सतीश जग्गी और सीबीआई ने इस बरी किए जाने के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। मुख्य तर्क यह था कि जिन सबूतों पर आरोपितों को उम्रकैद मिली, उन्हीं सबूतों पर अमित जोगी को बरी कैसे किया जा सकता है? इंडियन एविडेंस एक्ट के तहत साजिश अंधेरे में रची जाती है, जहां परिस्थितिजन्य साक्ष्य ही निर्णायक होते हैं।
दो अप्रैल को चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस अरविंद वर्मा की स्पेशल बेंच ने निचली अदालत के फैसले को पक्षपाती और अनुमानों पर आधारित करार देते हुए पलट दिया। अमित जोगी को हत्या की साजिश और हत्या का दोषी पाकर उम्रकैद की सजा सुनाई।
जोगी परिवार के राजनीतिक वजूद पर सकंट
इस फैसले ने अब जोगी परिवार के राजनीतिक भविष्य पर फिर से काले बादल मंडरा दिए हैं। अमित जोगी के लिए यह केस एक ऐसा नासूर साबित हुआ जिसने उनके करियर की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया। हालांकि वे 2007 में बरी हुए थे, लेकिन दागी होने का ठप्पा कभी नहीं छूटा।
अलग पार्टी जनता कांग्रेस बनानी पड़ी
इसी कानूनी संघर्ष और कांग्रेस के भीतर बढ़ते विरोध के चलते जोगी परिवार को अपनी अलग पार्टी जनता कांग्रेस बनानी पड़ी। आज यह परिवार न केवल कानूनी बल्कि अपने राजनीतिक वजूद को बचाने के लिए भी सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। यह फैसला जोगी परिवार के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है।
पहले से ही वजूद की लड़ाई लड़ रही जनता कांग्रेस के लिए अमित जोगी का जेल जाना एक अपूरणीय क्षति साबित हो सकता है। 20 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई अब इस परिवार की आखिरी उम्मीद है।




